Thursday, October 31, 2013

Halloween

It's Halloween Today !

Since last three years, I have been watching and participating in Halloween celebrations. It's a cool fall festival, which occurs annually on October 31st in western countries. I love the decorations, costumes, tricks and treats, ghosts and witches haunting, pumpkin carvings, visiting haunted places, scary stories and playing pranks. Amazing concept...really! :-) 
You could see tons of people with tons of festive and spooky ideas when Halloween is around. In India, we used to be scared of ghosts and witches as kids !! In western countries, I saw people celebrating and enjoying ghosts and witches ...its so much of fun!! Nothing really scary but entirely different concept, showing a contradiction in east and west cultures. 

It's ok to be weird, Is not it? My mom was surprised, when I told her about my first Halloween party and costume!! Ha ha ha....

Last year, I went to one of my American friend's house for celebration, where most of the people were scientists (grad students/postdocs etc.) and they dressed up in Einstein, Watson, butterfly, joker, witches etc.... I still can remember their costumes and actings.. I have also been to SALEM on Halloween day, a city in Massachusetts also known as ''witch city'' and famous for throwing the America's biggest and best Halloween celebration parties. We saw carnival and participated in the parade. Thousands of people on the road were walking in costumes of witches and ghosts at night. I had my sky-blue-shiny-long hair.... Of course artificially :-P...I dressed up as a witch with my magical broom. It was crazy! Damn crazy fun for me it was. My two other friends were also witches. We were friendly witches ...by the way!!

It's an experience. Did I say that loud? Be scary!!

Also, scientists at UMASS are not less...Today we had one talk in our department. The speaker came from Harvard and talked about "FEAR EXTINCTION"- the role of the brain in psychopathology of existence and extinction of FEAR and he started his talk with a sentence- It's Halloween today!! 

Happy Halloween...Friends!
Have a scary good time.
Boooooo!!



@ Ratna 


Friday, October 25, 2013

चित्कबरी कहानियाँ

चित्कबरे सिर्फ चीते नहीं ,
चित्कबरी कहानियाँ भी होती हैं,
यादों की उधेड़ बुन से जन्मी हुई,
खुबसूरत और बदशक्ल किरदारों के साथ,
सबके पास कहने -सुनने के लिए,
चित्कबरी कहानियाँ मिल जाती हैं।  
वृस्त्रित या सारांश सी,
अनचाही या मनचाही सी,
कभी पिन्जरे में बंद पंछी सी,
पंख फरफराती हुई,
ध्यान आकर्षित करने को आकुल सी,
तो कभी चिंतन मनन पर अमादा,
या कभी किसी श्रोता की प्रतीक्षा में,
चित्कबरी कहानियाँ होती हैं सबके पास।  
                                                       -  रत्ना


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Monday, October 21, 2013

जीवन

जब पतवार चले संग नावों के,
संगीत छलकते भावों के,
जीवन की सुमधुर छावो से,
हर दर्द सुखते घावो के,
मेरा जीवन, मेरा सपना,
हर साज लगे मुझको अपना। 
                                      -रत्ना

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Friday, October 18, 2013

मकसद क्या हैं?


आपाधापी में दौड़ती यह जिंदगी,
मुखौटो की शक्ल लिए घुमती-फिरती मिल जाती  हैं,
आस पास के चौराहों पर।
हकीकत क्या हैं?
कभी कभी सोचती हू मकसद क्या हैं?
वक़्त के हिसाब से बदलते चहरे,
अलग-अलग रंगों में घुले मिले से,
अटपटे से अंदाज में घूरते दिख जाते हैं,
बाजार में सजी दुकानो के आस-पास,
कुछ अभिलाषाए खरीदते हुए,
कुछ सपने बेचते हुए,
कभी नसीब का,
कभी तरकीब का,
कभी वर्चस्व का,
व्यवसाय चल रहा हैं।
कोई प्रतियोगिता हों शायद,
और फिर सोचती हू, जरूरत क्या हैं?
आखिर हकीकत क्या हैं?
                                -रत्ना

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Thursday, October 17, 2013

पतझर

आज लैब से वापस आने के समय बहुत सारे पत्ते नीचे गिरे दिखे मुझे, मेरे पैरो से टकराते, अलग अलग रंगों के, लाल, नारंगी, पीले और भूरे। पतझर का मौसम आ चुका हैं, मेरी यूनिवर्सिटी में दिखने लगा हैं, १७ अक्टूबर २०१३ की शाम,  एक प्याला चाय के साथ मेरे कुछ विचारो ने शब्दों का रूप लेने की छोटी सी एक कोशिश की हैं यहाँ पर.… 



हवा के  झोके ने एक पत्ते को पेड़ से नेचे गिरा दिया,
नीचे आने पर उसको बगल में लेटा हुआ दूसरा पत्ता दिखा,
चलो तुम भी आ गए, स्वागत हैं, हँसते हुए दुसरे पत्ते ने कहा,
पहला पत्ता दुखी था, पेड़ से जुदा होकर और आगे न जाने क्या होगा सोचकर,
उसके बाकी साथी पेड़ की टहनी से अभी भी लटके हुए थे,
उनको पेड़ की टहनी ने अपने ओट में छुपा कर हवा से बचा लिया था,
वो किनारे पर होकर अकेले लड़ता रहा,
उसका जन्मस्थान ही किनारे पर था, 
कितनी बार उसने कोशिश की थी और लड़ा था हवा से,
लेकिन एक बार हार गया, आखिरी बार,
और कब तक लड़ पता, हवा भी तो रुकने का नाम नहीं ले रही थी,
कितनी जोर जोर से चल रही थी,
उसने हर कोशिश की थी, फिर क्या कमी रह गयी अखीर,
आखिरी बार वो क्यूँ हार गया, 
उसको समझ नहीं आ रहा था,
यही आकुलता उसको अंदर से कचोट रही थी,
उसकी मनः स्थिति दुसरे पत्ते को समझ में आ गयी,
उसने कहा, तुम अनुचित ही दुखी हो मेरे दोस्त,
जो तुम सोच रहे हो कि तुम अकेले हो तो गलत हो तुम,
कुछ दिनों में पतझर आने वाला हैं,
वो सारे पत्ते जो अभी पेड़ पर हैं ,
तुम्हारे बगल में लेटे होंगे,
तुम हवा के साथ लडाई करते हुए शहीद हो गए,
खुद पर फक्र करो,
उनको पेड़ खुद नेचे गिरा देगा,
यही प्रकृति  का नियम हैं! 
वो सब भी तुम्हारे साथ नेचे लेटे होंगे,
लेकिन तुममे और उनमे बहुत अन्तर होगा,  
इस अन्तर पर फक्र करो!
क्यूंकि आसान जीवन में मजा कम हैं,
रोमांचकता भी कम हैं,
पर सभी का एक अंत हैं,
और अंत एक नयी सुरुवात के लिए जरूरी हैं,
जिसको प्रकृति समझती है!

                                             -रत्ना
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Monday, April 12, 2010

सफ़र


कुछ जाने पहचाने से रस्ते,
मुझसे होकर गुजरते हैं,
कुछ अनजाने से रस्ते,
मुझसे होकर गुजरते हैं,
कुछ लोग मिलते हैं,
कुछ देर साथ चलते हैं,
कुछ दोस्त मिलते हैं,
कुछ बात करते है,
यह सफ़र हैं यारों,
तय हो जाता है यू ही,
कुछ लोग होते हैं, जो याद करते हैं.
                                               -रत्ना
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