Wednesday, June 22, 2016

बचपन और मैं

मन की गहरयो में, पुरानी यादों का एक कमरा है, 
उसी की खिड़की से झकता है -"मेरा बचपन",
हम-दोनों  बात करते हैं कभी-कभार यू ही.  
आज मुझसे पूछने लगा- कैसी हो ?
वक़्त बदल गया,
लोग बदल गए,
नए -पुराने तजुर्बे ने,
जिंदगी सुहावनी बना दी होगी,
चलते-चलते काफी आगे निकल आई हो?
बताओ -कैसी हो?
फिर, सोच ने मन में दस्तक़ दी,
भागम-भागी की जिंदगी में, 
हम भी खेल रहे हैं, जीवन के दाव-पेच,
झूठे आडम्बरो का मुखौटा पहने लोगो से,
मिलते रहते हैं आज-कल, 
कल्पना की उड़ान छोटी हो गयी,
भावनाओ ने रास्ता बदल दिया,
रिश्तों ने मोहब्बतें समझा दी,
यथार्थ से परिचय हो गया,
कुछ पा लिया, कुछ खो गया, 
ख्वाहिशो के जगलों में भटकता,
नियम -कानून में जकड़ा यही इंसान,
भोली -भली  बचपन की जिंदगी को न जाने कब भूल गया?

और फिर एक सयानी सी मुस्कान के साथ,
मैंने अपने बचपन की ओर देखा,
वो मस्त-मगन हो मेरे भूतकाल में खेल रहा था! 

-रत्ना 

एक लघु कथा



आज जिंदगी की किताब में संजोग से एक लघु कथा जुड़ गयी,
इन पन्नो में खूबसूरत भावनाए हैं,
कुछ यादो में सजाने लायक लम्हे हैं।
भारत और अमेरिका के बीच की दूरियों का एह्साह हैं,
कुछ स्काइप स्क्रीन पर दिखने वाले उसके चहरे की मुश्कान हैं।
उसके आँखों की चमक हैं,
कुछ सुन्दर ख्वाब हैं।
कुछ हसी हैं,
कुछ मजाक है,
कुछ गम के नाम लिखे जज्बात हैं।
उसने मुझसे सबब ले लिया,
वक़्त गुजर गया,
एक सुन्दर कहानी की सम्भावना ने,
कुछ वक़्त की कमी और कुछ दूरियों के कारण दम तोड़ दिया।

-रत्ना



हम न समझे थे बात इतनी सी ....ख़्वाब  शीशे के.… दुनियां पत्थर की !

फाइनली the word i remember is - Serendipity 
























Wednesday, August 13, 2014

अंतर्मन का मंथन

क्यूँ चक्रवात प्रचंड उठे हैं,
क्यों अंतर्मन में हैं हलचल,
यह कैसी दुविधा में दिल फंस गया,
निर्मोही मन की व्यथा सुन कर।
अक्सर जज्बातों की शक़्ल लिए,
कुछ रिश्ते क्षरभंगुर से होकर,
सवाल करते हैं कि,
क्या तेरा वजूद ही बेमानी हैं?
वजह हम हैं, सबब भी हम।
चोट हम हैं, मरहम भी हम।
अंतर्मन के मंथन से,
शुन्य हाथ में आता हैं।
यह कैसी विडम्बना हैं आखिर?
मन-मष्तिस्क घबराता हैं।
कई बार हारे हैं फैसलों में,
कभी अपनो में, तो कभी सपनो में।
कभी जज्बात उछाल लिए,
तो कभी कठोर बनना नहीं आया,
निर्दय हो कर समाज ने फ़िर,
मुझको ही दोषी ठहराया,
ठोकर खा कर समझे  भी तो,
अब सोच रहे हैं,
क्या खोया और क्या पाया?
किसी के लिए सबब बन गए,
फिर बोल दिया सब मोह -माया।
                                           -रत्ना









Friday, October 25, 2013

चित्कबरी कहानियाँ

चित्कबरे सिर्फ चीते नहीं ,
चित्कबरी कहानियाँ भी होती हैं,
यादों की उधेड़ बुन से जन्मी हुई,
खुबसूरत और बदशक्ल किरदारों के साथ,
सबके पास कहने -सुनने के लिए,
चित्कबरी कहानियाँ मिल जाती हैं।  
वृस्त्रित या सारांश सी,
अनचाही या मनचाही सी,
कभी पिन्जरे में बंद पंछी सी,
पंख फरफराती हुई,
ध्यान आकर्षित करने को आकुल सी,
तो कभी चिंतन मनन पर अमादा,
या कभी किसी श्रोता की प्रतीक्षा में,
चित्कबरी कहानियाँ होती हैं सबके पास।  
                                                       -  रत्ना


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Monday, October 21, 2013

जीवन

जब पतवार चले संग नावों के,
संगीत छलकते भावों के,
जीवन की सुमधुर छावो से,
हर दर्द सुखते घावो के,
मेरा जीवन, मेरा सपना,
हर साज लगे मुझको अपना। 
                                      -रत्ना

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Friday, October 18, 2013

मकसद क्या हैं?


आपाधापी में दौड़ती यह जिंदगी,
मुखौटो की शक्ल लिए घुमती-फिरती मिल जाती  हैं,
आस पास के चौराहों पर।
हकीकत क्या हैं?
कभी कभी सोचती हू मकसद क्या हैं?
वक़्त के हिसाब से बदलते चहरे,
अलग-अलग रंगों में घुले मिले से,
अटपटे से अंदाज में घूरते दिख जाते हैं,
बाजार में सजी दुकानो के आस-पास,
कुछ अभिलाषाए खरीदते हुए,
कुछ सपने बेचते हुए,
कभी नसीब का,
कभी तरकीब का,
कभी वर्चस्व का,
व्यवसाय चल रहा हैं।
कोई प्रतियोगिता हों शायद,
और फिर सोचती हू, जरूरत क्या हैं?
आखिर हकीकत क्या हैं?
                                -रत्ना

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Monday, April 12, 2010

सफ़र


कुछ जाने पहचाने से रस्ते,
मुझसे होकर गुजरते हैं,
कुछ अनजाने से रस्ते,
मुझसे होकर गुजरते हैं,
कुछ लोग मिलते हैं,
कुछ देर साथ चलते हैं,
कुछ दोस्त मिलते हैं,
कुछ बात करते है,
यह सफ़र हैं यारों,
तय हो जाता है यू ही,
कुछ लोग होते हैं, जो याद करते हैं.
                                               -रत्ना
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